Monday, April 12, 2021
Wednesday, April 7, 2021
सामाजिक संस्था टीम एपी द्वारा विद्यालय की होनहार छात्रा क्राँति को स्वावलंबी बनाने हेतु एक सिलाई मशीन प्रदान की गयी! ।
सामाजिक सरोकारों से जुड़ी संस्था टीम एपी के तत्वाधान में क़ुरसंडा उच्च प्राथमिक विद्यालय में संस्था के प्रमुख अरूण प्रताप सिंह भदौरिया द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया! उनके द्वारा बालिका शिक्षा को और प्रगतिशील बनाने का आवाहन करते हुए उसमें गुणात्मक वर्धन हेतु कई बेहतर संदेश दिए गए।
Sunday, March 28, 2021
स्नेह और सौहार्द का प्रतीक रंगो का त्यौहार होली पर्व!
रंगों के त्यौहार’ के तौर पर मशहूर होली का त्योहार फाल्गुन महीने में पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। तेज संगीत और ढोल के बीच एक दूसरे पर रंग और पानी फेंका जाता है। भारत के अन्य त्यौहारों की तरह होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। प्राचीन पौराणिक कथा के अनुसार होली का त्योहार, हिरण्यकश्यप की कहानी जुड़ी है।
हिरण्यकश्यप प्राचीन भारत का एक राजा था जो कि राक्षस की तरह था। वह अपने छोटे भाई की मौत का बदला लेना चाहता था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। इसलिए अपने आप को शक्तिशाली बनाने के लिए उसने सालों तक प्रार्थना की। आखिरकार उसे वरदान मिला। लेकिन इससे हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझने लगा और लोगों से खुद की भगवान की तरह पूजा करने को कहने लगा। इस दुष्ट राजा का एक बेटा था जिसका नाम प्रहलाद था और वह भगवान विष्णु का परम भक्त था। प्रहलाद ने अपने पिता का कहना कभी नहीं माना और वह भगवान विष्णु की पूजा करता रहा। बेटे द्वारा अपनी पूजा ना करने से नाराज उस राजा ने अपने बेटे को मारने का निर्णय किया। उसने अपनी बहन होलिका से कहा कि वो प्रहलाद को गोद में लेकर आग में बैठ जाए क्योंकि होलिका आग में जल नहीं सकती थी। उनकी योजना प्रहलाद को जलाने की थी, लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई। होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, इसलिए होली का त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है।
यह कहानी भगवान विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण के समय तक जाती है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे, इसलिए होली का त्योहार रंगों के रूप में लोकप्रिय हुआ। वे वृंदावन और गोकुल में अपने साथियों के साथ होली मनाते थे। वे पूरे गांव में मज़ाक भरी शैतानियां करते थे। आज भी वृंदावन जैसी मस्ती भरी होली कहीं नहीं मनाई जाती।
होली वसंत का त्यौहार है और इसके आने पर सर्दियां खत्म होती हैं। कुछ हिस्सों में इस त्यौहार का संबंध वसंत की फसल पकने से भी है। किसान अच्छी फसल पैदा होने की खुशी में होली मनाते हैं। होली को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहा जाता है!
प्राचीन भारत के मंदिरों की दीवारों पर भी होली की मूर्तियां बनी हैं। ऐसा ही 16वीं सदी का एक मंदिर विजयनगर की राजधानी हंपी में है। इस मंदिर में होली के कई दृश्य हैं जिसमें राजकुमार, राजकुमारी अपने दासों सहित एक दूसरे पर रंग लगा रहे हैं।
कई मध्ययुगीन चित्र, जैसे 16वीं सदी के अहमदनगर चित्र, मेवाड़ पेंटिंग, बूंदी के लघु चित्र, सब में अलग अलग तरह होली मनाते देखा जा सकता है।
पहले होली के रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे और उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों की परिभाषा बदलती गई। आज के समय में लोग रंग के नाम पर कठोर रसायन का उपयोग करते हैं। इन खराब रंगों के चलते ही कई लोगों ने होली खेलना छोड़ दिया है। हमें इस पुराने त्यौहार को इसके सच्चे स्वरुप में ही मनाना चाहिए।(साभार)
Saturday, March 27, 2021
किरदार ऐसा जियो कि दुनियाँ याद करे!
रंगमंच है दुनियाँ सारी, किरदार हमें निभाना है....
आप सभी को विश्व रंगमंच दिवस की हार्दिक शुभकामनाये🌹
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अंतरराष्ट्रीय रंगमंच संस्थान द्वारा 1961 इस दिन को मनाने की शुरुआत की गई। इस अवसर पर किसी एक देश के रंगकर्मी द्वारा विश्व रंगमंच दिवस के लिए आधिकारिक सन्देश जारी किया जाता है। 1962 में फ्रांस के जीन काक्टे पहला अंतरराष्ट्रीय सन्देश देने वाले कलाकार थे। कहा जाता है कि पहला नाटक एथेंस में एक्रोप्लिस में स्थित थिएटर ऑफ डायोनिसस में आयोजित हुआ था। यह नाटक पांचवीं शताब्दी के शुरुआती दौर का माना जाता है। इसके बाद रंगमंच पूरे ग्रीस में बहुत तेज़ी से फैला।
इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों में रंगमंच को लेकर जागरुकता लाना और रंगमंच के महत्व को समझाना है। रंगमंच न सिर्फ लोगों का मनोरंजन करता है बल्कि उन्हें सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक भी करता है। जिस देश के कलाकार का संदेश इस दिन प्रस्तुत किया जाता है जिसका लगभग 50 भाषाओं में अनुवाद किया जाता है और दुनियाभर के समाचार-पत्रों में वह छपता है।
भारत में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना माना है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि नाट्यकला का विकास सबसे पहले भारत में ही हुआ। ऋग्वेद के कतिपय सूत्रों में यम और यमी, पुरुरवा और उर्वशी आदि के कुछ संवाद हैं। इन संवादों को पढ़कर कई विद्वानों का कहना है कि नाटक की शुरुआत यहीं से हुई !
माना जाता है कि भरतमुनि ने नाट्यकला को शास्त्रीय रूप दिया है। भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटकों के विकास की प्रक्रिया को लिखा है, "नाट्यकला की उत्पत्ति दैवी हैं, अर्थात दु:खरहित सतयुग बीत जाने पर त्रेतायुग के आरंभ में देवताओं ने ब्रह्मा से मनोरंजन का कोई ऐसा साधन उत्पन्न करने की प्रार्थना की जिससे देवता लोग अपना दु:ख भूल सकें और आनंद प्राप्त कर सकें।(साभार)
Tuesday, March 23, 2021
भारत माता के वीर सपूतों को मेरा सलाम!
आज ही की तारीख में 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी। भारतवर्ष को आजाद कराने के लिए इन वीर सपूतों में हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया था, इसलिए इस दिन को शहीद दिवस कहा जाता है। भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिया जाना हमारे देश इतिहास की बड़ी एवं महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।
भारत के इन महान सपूतों को ब्रिटिश हुकूमत ने लाहौर जेल में फांसी पर लटकाया था। इन स्वंतत्रता सेनानियों के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अंग्रेजों ने इन तीनों को तय तारीख से पहले ही फांसी दे दी थी। तीनों को 24 मार्च को फांसी दी जानी था। मगर देश में जनाक्रोश को देखते हुए गुप-चुप तरीके से एक दिन पहले ही फांसी पर लटका दिया गया। पूरी फांसी की प्रक्रिया को गुप्त रखा गया था।
महान क्रांतिकारियों की पुण्य तिथि पर उनको शत् शत् नमन!
Saturday, March 20, 2021
अनवर फर्रुखाबादी 'फना'
जिन्हें हम भूल गए और जो हमारे बीच से चले गए ऐसी शख्सियत है अनवर फर्रुखाबादी ।
अनवर फर्रुखाबादी को फर्रुखाबाद के लोग ही नहीं जानते है।
अनवर फर्रुखाबादी'फना' का जन्म मोहल्ला नखास फर्रुखाबाद में 19 जुलाई 1928 में हुआ गरीब परिवार में जन्मे अनवर साहब को शायरी का शौक अपने वालिद हाफिज अशफाक हुसैन से विरासत में मिला। 19 साल की उम्र में छपाई कारीगर अनवर हुसैन रोजगार की तलाश में मुंबई पहुंचे और वहां उनकी मुलाकात उस जमाने के मशहूर कव्वाल इस्माइल आजाद से हुई ।अनवर साहब की पहचान बॉलीवुड में गीतकार के रूप में अनवर फर्रुखाबादी के नाम से हुई। अनवर साहब ने बॉलीवुड में लगभग 2000 गीत, गजल,कव्वाली का सृजन किया। उनके गीतों को मन्नाडे,पंकज उधास, शंकर शंभू और साबिर बंधुओं के अलावा उस वक्त के सभी नामी गायकों ने अपनी आवाज दी।
वर्ष 1992 में अनवर साहब फर्रुखाबाद आ गए और 82 वर्ष की उम्र में 29जून 2011 को इस दुनिया से इस विदा हो गए
अनवर साहब के कुछ लोकप्रिय गीत और गजल-
* हमें तो लूट लिया मिलके हुस्न वालों ने
* जिंदगी भर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात
* हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं
* यह जो हल्का-हल्का सुरूर है
* सबको मालूम है मैं शराबी नहीं
ऐसी महान शख्सियत को मेरी श्रद्धांजलि।
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया
मो.9450913131
Translation: Anwar Farrukhabadi 'Fana'
Those whom we have forgotten and who have left us, such a person is Anwar Farrukhabadi.
The people of Farrukhabad are not known to Anwar Farrukhabad.
Born Anwar Farrukhabadi'Safna 'in Mohalla Nakhas Farrukhabad on 19 July 1928, Anwar Saheb inherited Shayari from his father Hafiz Ashfaq Hussain. At the age of 19, the printing artisan Anwar Hussain arrived in Mumbai in search of employment and there he met the then famous Qawwal Ismail Azad. Anwar Saheb was identified as Anwar Farrukhabadi as a lyricist in Bollywood. Anwar Sahab composed about 2000 songs in Bollywood, Ghazal, Qawwali. His songs were sung by all the renowned singers of that time, apart from Mannade, Pankaj Udhas, Shankar Shambhu and Sabir brothers.
In 1992, Anwar Saheb came to Farrukhabad and left this world on 29 June 2011 at the age of 82.
Some popular songs and ghazals of Anwar Sahab
* Hame to loot liya milke Hushn walo ne
* Zindagi Bhar nahi bhoolegi wo barsat ki raat
* Ham kale hai to kya hua .. Dilwale hai
* Ye jo halka halka suroor hai..
* Sabko maaloom hai mai sharabi nahi
My tribute to such a great personality.
Arun Pratap Singh Bhadoria
Mo.9450913131
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