Thursday, April 17, 2014

अशोक रावत की ग़ज़लें


(2 )
 लियाक़त है न मेरे पास जीने का क़रीना है,
मगर एक हौसला है,चाहे जो हो मुझको जीना है.

समंदर ही समंदर है, जहाँ तक देख पाता हूँ,
मुझे किस बात का डर हो, कहाँ मेरा सफ़ीना है.

मैं अपने घर को केवल घर नहीं मंदिर समझता हूँ,
यही काशी यही मथुरा यही मेरा मदीना है.

किसी अंजाम तक पहुँचे न पहुँचे ग़म नहीं मुझको,
मेरी नज़रों में हर पत्थर,चमकता एक नगीना है.

तसल्ली है मुझे इस बात की मैं सो तो लेता हूँ,
मेरे हाथों की हर रेखा में मेहनत का पसीना है.

मेरे बच्चों की गुल्लक में भी शायद कुछ नहीं होगा,
मगर संकल्प है मन में कि अपने दम पे जीना है

(3) 

मुझसे नफ़रत भी करते हैं, मेरे दीवाने भी हैं,
उलझी उलझी चाहत के कुछ ऐसे अफ़साने भी हैं.

तन्हाई का शोर जहाँ पर चैन नहीं लेने देता,
जिनमें पूरी दुनिया है कुछ ऐसे वीराने भी हैं.

जिन लोगों ने पत्थर फैंके उनमें कोई ग़ैर नहीं,
क्या बोलूँ सब अपने हैं और जाने पहचाने भी हैं.

कुछ जाने पहचाने साये रहते हैं एक मुद्दत से,
मेरे भीतर सीले-सीले से कुछ तहख़ाने भी हैं.

उनके बारे में सोचूँ तो दिल को राहत मिलती है,
झूठ नहीं बोला करते कुछ ऐसे पैमाने भी हैं.

(4)
 इतना हो, मुझको दुख की परवाह न हो,
मर जाऊँ लेकिन होठों पर आह न हो.

जीने का आनंद इसी जीने में है,
जीना हो लेकिन जीने की राह न हो.

जैसे खुशबू फूलों में बस जाती है,
तुझ में रहूँ और मुझको तेरी चाह न हो.

जितने अँधेरे हैं सब मेरे वश में हैं,
कोई उजाला अब मेरा हमराह न हो.

मेरी गज़लें हैं सच्ची पहचान मेरी,
कोई मेरे चेहरे से गुमराह न हो.

पहले मेरी बस्ती में स्कूल खुले,
बेशक़ उसमें मंदिर या दरगाह न हो.

कोई कुछ भी बोले ये नामुमकिन है,
अच्छे शेर हों लेकिन उन पर वाह न हो