@ १ @
उनका न कोई मजहब है न ईमान ,
स्वार्थ में लेते हैं जो निर्दोषों की जान !
उनका न कोई राम है न रहमान ,
आतंक की खातिर देते है जो मौत का फ़रमान !
@2 @
हाँथ में लेखनी उठा लीजिये ,
दिल में ज्वाला जगा लीजिये ,
सोई कौम को जगाने की खातिर,
लहू की स्याही बना लीजिये !
@3@
नफरत जो उगले ऐसी लेखनी तोड़ दो !
भाईचारा ना सिखाये ऐसे मजहब को छोड़ दो !
मासूमों की सिसकियों से जिन्हें खुशिया मिलें !
ऐसे द्रोहियों के हाँथ ,पैर और सिर तोड़ दो!