Tuesday, June 4, 2013

मेरी रचना - (भाग -३)


                  ( 1 )

क्रिकेट अब नहीं रहा ,जेंटलमैन का खेल I 
सट्टेबाजी हो रही ,खिलाड़ी जा रहे जेल I 
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '

       
             (2)

भ्रस्टाचार का दीमक ,
देश को चाट रहा है I 
जातिबाद का बिच्छू ,
एकता में डंक मार रहा है I 
महगाई का सांप ,
जनता को काट रहा है I 
धन्य है हमारा देश ,
जो दागिओं को, 
मंत्री पद बाँट रहा है I 
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '


         ( 3)

एक आया है तो एक जाएगा I 
न साथ लाया था कुछ ,
न साथ कुछ ले जायेगा I 
तेरी दौलत का खजाना ,
तेरे काम ना आयेगा I 
कुछ तो अच्छा कर ले बन्दे ,
यही तेरे साथ जाएगा I 
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '

              
                 ( 4 )

रूठना मनाना राजनितिक मजबूरी है ,
जनता को दिखाने के लिए यह भी जरूरी है I 
उम्र के इस पड़ाव में लगता है ,
प्रधानमंत्री बने बिना जिंदगी अधूरी है I 
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '


                   ( 5 )

मुह पर कालिख लगी हुई है, फिर भी पद पर बैठे है I 
सी बी आई की जांच वो बड़े प्रेम से सहते है I 
सत्ता की मदहोशी उनके ऊपर छाई है I 
उनके ही दम ने यह सरकार बचाई है I 
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया 'राज'



                 ( 6 )

जो भाग्य भरोसे रहते है 
वो कष्ट हमेशा सहते हैं 
जो मेहनत को अपनाते है 
वो कामयाब हो जाते हैं 
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया 'राज'