जिन्दगी से मौत तक की दर्दनाक दास्तां.......११-७-२०१३ बहराइच !! पूर्व विधायक भगौती प्रसाद.... नाम आप में से ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना होगा। भगौती प्रसाद दो बार श्रावस्ती की इकौना सुरक्षित सीट से विधायक रहे लेकिन अब मरने के बाद उनके कफन तक के लाले पड़ गये. 70 के दशक में दो बार विधायक रहने के बाद भी ईमानदारी और उसूलों की वजह से पूरी जिंदगी मुफलिसी में गुजारी और 70 साल की उम्र में इलाज के बिना मौत हुई तो बेटों के पास इतने पैसे नहीं थे कि कफन नसीब हो। गांव वालों ने चंदा करके उनका अंतिम संस्कार किया. भगौती प्रसाद पंचतत्व में विलीन हो गए, लेकिन उसूलों के लिए उनके संघर्ष की कहानी आगे भी जिंदा रहेगी. उन्होंने 1990 से 2000 तक गांव मदारा के चौराहे पर चाय और चने बेचे, खेतों में मजूदरों के साथ कुदाल भी चलाई लेकिन किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। सवाल यह है कि क्या हम इससे प्रेरणा और सीख लेंगे। भगौती प्रसाद के तीन बेटे हैं, लेकिन किसी के पास नौकरी नहीं है। सभी खेती का काम करते हैं। दूसरे नंबर के बेटे गांधी प्रसाद ने कहा, ' मेरे पिता एक ईमानदार नेता था। वह कभी भी किसी के पास मदद के लिए नहीं गए। 8 महीने से उनकी तबीयत काफी खराब थी और पेंशन लेने लखनऊ तक नहीं जा पा रहे थे।' आज की चकाचौंध भरी राजनीति के आगे भगौती प्रसाद की दास्तां बेहद दर्दनाक है। उत्तर-प्रदेश के श्रवस्ती जिले में इकौना थाना क्षेत्र के मदारा गांव के रहने वाले भगौती प्रसाद ने अपना राजनीतिक सफर पूर्व सांसद केके नय्यर के मार्गदर्शन में वर्ष 1964 में शुरू किया था। इसके बाद जनसंघ के टिकट पर वह 1967 और 1969 में दो बार इकौना के विधायक चुने गए। गांधीवादी विचारधारा के भगौती प्रसाद ने कभी भी अपने सिद्धांतों और आदर्शों से समझौता नहीं किया। वर्तमान दौर के नेताओं को देखकर शायद ही किसी को यकीन हो कि दो बार विधायक रहने के बाद भी उन्हें 10 साल तक चाय और चने बेचकर पेट की आग बुझानी पड़ी। भगौती प्रसाद हर्निया और दमे से पीड़ित थे। तबीयत बिगड़ने पर पिछले सप्ताह परिवार वालों ने उन्हें शहर के निजी नर्सिंग होम में भर्ती कराया, लेकिन कुल जमा पूंजी तीन दिन में ही खत्म हो गई। इसके बाद रविवार को उन्हें बहराइच जिला अस्पताल लाया गया। पहले तो अस्पताल प्रशासन ने उन्हें डेढ़ घंटे तक भर्ती नहीं किया और वह फर्श पर ही तड़पते रहे। स्थानीय मीडिया में जब बात आई तब डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती तो किया, लेकिन इलाज में हीलाहवाली जारी रही। सोमवार को हर्निया के ऑपरेशन के लिए उन्हें एक यूनिट ब्लड की जरूरत थी, लेकिन छह घंटे तक इसलिए ऑपरेशन नहीं हो सका क्योंकि परिवार के पास ब्लड खरीदने के लिए एक हजार रुपये नहीं थे। घंटों पीड़ा से गुजरने के बाद उन्हें एक यूनिट ब्लड मिला और इलाज शुरू हुआ। साफ है कि मुफलिसी में पैदा हुए भगौती प्रसाद का साथ जीवन भर मुफलिसी ने नहीं छोड़ा। अंतिम समय भी मुश्किलों भरा रहा......LOK JUNG .Thursday, July 11, 2013
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