Tuesday, May 14, 2013

मेरी रचना

            (1)
सच कहना कितना मुश्किल 
सच सुनना कितना मुश्किल 
सच है कि सच का क़त्ल हो रहा है 
हर चौराहे पर सच रो रहा है 
सच कहू आज सच उदास है 
कोई नहीं उसके आसपास है 
            (अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज ')

              ( 2)
अंधेरो का साया अब डराने लगा है I 
उल्लुओं का गाना सबको भाने लगा है I 
नफरत की आग जो जलाते रहे I 
देश उनको ही नेता बनाने लगा है I 
        अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '

                     ( 3 )
कितनो को खोया हमने , कितनो को पाया I 
दर्द मिला था जिनसे ,उनको भी गले लगाया I
                    अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '

                   ( 4 )

एक लुटेरा चला गया है, 
कई लुटेरे आयेंगे I 
अपनों की गद्दारी से हम,
रोज ही लुटे जायेंगे I 
आज हमारी बारी है,
 कल तुम्हारी भी होगी  I 
  अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '

                  ( 5 )

हाँथ में लेखनी उठा लीजिये ,
दिल में ज्वाला जगा  लीजिये ,
सोई कौम को जगाने की खातिर ,
लहू की  स्याही  बना लीजिये I 

        अरुण प्रताप सिंह भदौरिया  ' राज  '

                 ( 6 )

उफ़ यह, गर्मी I
नेताओ ने ओढ़ी ,बेशर्मी I
मैच फिक्सिंग करें , अधर्मी I
धर्म के रक्षक बने , कुकर्मी I

        अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '