नक्सली हमला - जिसकी हो रही है चारो और निंदा , खासतौर पर वो नेता जो यह मानने को तैयार नहीं होते थे कि नक्सली हिंसा भी करते है वह तो उनसे बात चीत करके समझौता करके अपनी राजनितिक रोटियां सेंकने कि जुगत में लगे रहते थे , वर्षों से निरीह जनता और सुरक्षा वलों कि हत्याएं इन्ही नक्सल वादियों द्वारा कि जाती रही और हमारा तंत्र मौन रहा , इनकी ताक़त एक दिन में नहीं बढी , इनकी ताकत बढ़ने के पीछे कही न कहीं स्वार्थ की राजनीति का हाँथ है ,काश हमारे नेताओं की आँखें तब खुल जाती जब निरीह जनता और सुरक्षा वल इनके शिकार बन रहे थे , अगर ऐसा होता तो यह घटना होती ही नहीं , बड़े बड़े नेता दम भर रहे है कि हम नक्सल वादिओं के खिलाफ कठोर कार्यवाही करेंगे , घटना के तीन दिन बीत जाने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं हुई , इससे बड़ी शर्म कि बात हमारे लिए क्या हो सकती है , बंद करो फालतू कि बयान बाजी , अगर कुछ नहीं कर सकते तो चुप रहो, हिंसा का जवाब हिंसा से देना होगा तभी कुछ बात बनेगी , मुझे शिव ओम अम्बर दादा कि पंक्तियाँ याद आ रही है --
सांप जब तक ना आस्तीनों के मारे जायेंगे ,
हौसला कितना भी हो हम जंग हारे जायेंगे I
देश के दुश्मनों से हम फिर करेंगे फैसला ,
पहले सर जाहिलों के उतारे जायेंगे I
- अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '
शाहजहांपुर
सांप जब तक ना आस्तीनों के मारे जायेंगे ,
हौसला कितना भी हो हम जंग हारे जायेंगे I
देश के दुश्मनों से हम फिर करेंगे फैसला ,
पहले सर जाहिलों के उतारे जायेंगे I
- अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '
शाहजहांपुर