(1)
बृक्ष खुदही अब फल भखें ,
नदी ही संचय नीर I
अपने हित के कारणे ,
सबको दे दो पीर I
(2)
नेताओं को ना खिलाइए ,
जाको मोटो पेट I
इनकी एक डकार से ,
सब हो मटियामेट I
(3)
निर्वल को ही सताइए ,
जो कुछ ना कह पाए I
सबल के इक फ़ोन से ,
पुलिस दौड़ी आये I
(4)
पुलिस उसे ही पीटती,
जो हो बहुत गरीब I
उससे कुछ ना बोलती,
जो हो सत्ता के करीब I
रचनाकार - अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज '