Thursday, May 23, 2013

'राज' के दोहे



            
           (1)
बृक्ष खुदही अब फल भखें ,
नदी ही संचय  नीर I 
अपने हित के कारणे ,
सबको दे दो पीर I 

           (2)
नेताओं को ना खिलाइए ,
जाको मोटो पेट I 
इनकी एक डकार से ,
सब हो मटियामेट I 

            (3)
निर्वल को ही सताइए ,
जो कुछ ना कह पाए I  
सबल के इक फ़ोन से , 
पुलिस दौड़ी आये I 

              (4)
पुलिस उसे ही पीटती,
जो हो बहुत गरीब I 
उससे कुछ ना बोलती, 
जो हो सत्ता के करीब I 
              रचनाकार -   अरुण प्रताप सिंह भदौरिया ' राज  '