Wednesday, March 10, 2021

सत्य ही शिव है, शिव ही सुंदर है !

 

       आदिदेव पशुपति शिव भोले भंडारी सहित अनेक नामों से हम अपने आराध्य शिव शंकर की स्तुति करते हैं !  
महाशिवरात्रि का पर्व अध्यात्म पथ पर चलने वाले साधकों के लिए  महत्वपूर्ण है! यह उनके लिए भी महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं ! पारिवारिक परिस्थितियों  वाले लोग महाशिवरात्रि को शिव विवाह के उत्सव के रूप में मनाते हैं! यौगिक परंपरा में शिव को किसी देवता की तरह नहीं पूजा जाता है. उन्हे आदि गुरु माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि ध्यान की अनेक सहेस्त्राब्दियों के बाद, एक दिन वह पूर्ण रूप से स्थिर हो गये. इस लिये साधक महा शिव रात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते है!
आप अपनी आंखें खोल कर आसपास देखें तो आप केवल विशाल वस्तुओ को देख सकते हैऔर यदि आपके पास सूक्ष्मदर्शी है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे ! उदाहरण के तौर पर आकाशगंगा दिखाई देती है परंतु उसे थामें रहने वाली शक्ति सभी लोगों को दिखाई नहीं देती है! जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं तो दीपक को प्रकाश के रूप में दर्शाते हैं! एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी और वे सबसे अधिक करुणामई भी है योगी कथा में वे अनेक स्थानों पर महाकरुणामई के रूप में सामने आते है!
शिवपुराण में वर्णित शिवजी के निराकार स्वरूप का प्रतीक लिंग शिवरात्रि की पावन तिथि की महानिशा में प्रकट होकर सर्वप्रथम ब्रह्मा विष्णु के द्वारा पूजा गया।  फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि को आदि देव भगवान शिव करोड़ों सूर्यो के समान प्रभाव वाले ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए थे, महाशिवरात्रि का शिव तत्व से घनिष्ठ संबंध है, यह पर्व शिव के  दिव्य अवतरण का मंगल सूचक है, उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि  ही  महाशिवरात्रि कहलाती है, यह रात्रि हमें काम, क्रोध मोह, मत्सर आदि विकारों से मुक्त करके परम सुख शांति एवं ऐश्वर्य प्रदान करती है, वातावरण सहित घूमती धरती या अनंत ब्रह्मांड का अक्स ही लिंग है, इसलिए इसका आदि व अंत देवताओं तक के लिए अज्ञात है ,सौरमंडल के ग्रहों के घूमने की कक्षा ही सिर के तन पर लिपटे सर्प हैं ,सूर्य चंद्रमा अग्नि ही उनके तीन नेत्र हैं, बादलों के झुरमुट जटाएं ,आकाश जल ही सिर पर स्थित गंगा, और सारा ब्रह्मांड ही उनका शरीर है । मानवीकरण में वायु, प्राण, 10 दिशाएं पंचमुखी महादेव के दस कान, हृदय सारा विश्व, सूर्य नाभि ,और अमृत यानी जलयुक्त कमंडल हाथ में रहता है शून्य आकाश अनंत ब्रह्मांड और निराकार परम पुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है ,आकाश स्वयं लिंग है, धरती उसका आधार  है, सब अनंत सून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा गया है, भगवान शिव की अपारशक्ति और भक्ति का पर्व महाशिवरात्रि ! पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस रात्रि में जो धर्म कर्म मांगलिक अनुष्ठान अथवा संकल्पित कार्य किए जाते हैं, उनका फल अक्षुण्य रहता है!
आप सभी पर भोले बाबा अपनी कृपा बनाये रखे!🌹
अरुण प्रताप सिंह भदौरिया
(कवि, लेखक,रंगकर्मी, ब्लॉगर, समाजसेवी, फिलेटलिस्ट,
सिने एक्टर, फ़ाइनेंसिएल एडवाइजर, मोटीवेशनल स्पीकर, मंच संचालक, ट्रेड यूनियन लीडर, शार्ट फ़िल्म मेकर)
पोस्ट मास्टर (HSG-I)
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